कौन है गिग वर्कर्स और सरकार से किया है मांग गिग वर्कर्स की प्रमुख मांगें

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देशभर के गिग वर्कर्स जैसे जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और जेप्टो के राइडर्स स्वतंत्र रूप से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले कर्मचारी को गिग वर्कर्स खा जाता है गिग वर्कर्स के लिए काम के कोई समय तय नहीं होता है। ऐसे वर्कर्स को कंपनी के समझौता के अनुसार कभी भी काम करने के लिए तैयार रहना पड़ता है। भारत में अधिकांश गिग वर्कर ऑनलाइन फूड प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स कंपनी और सामान की डिलीवरी जैसे कार्यों से जुड़े हैं।

भारत में गिग वर्कर्स के लिए कानून

गिग वर्कर्स का कहना है कि वे लंबे समय से सिस्टम के शोषण का शिकार हो रहे हैं. उनकी बड़ी शिकायतों। वर्कर्स अपनी मांगें लेकर PM मोदी और अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मेमोरेंडम भी दे चुके हैं। सरकार ने 1 फरवरी को पेश बजट से पहले आए इकोनॉमिक सर्वे में माना कि ज्यादातर गिग वर्कर्स 15 हजार रुपए से भी कम कमा रहे हैं। इनके लिए पॉलिसी बननी चाहिए लेकिन बजट में कोई घोषणा नहीं हुई

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भारत सरकार ने 2020 के कोड ऑफ सोशल सिक्योरिटी और 2025 में लागू हुए नए श्रम कानूनों के तहत गिग और प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स को कानूनी मान्यता दी है.इनके लिए हेल्थ बीमा, एक्सीडेंट बीमा, पेंशन और मातृत्व लाभ जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं बनाई गई हैं, जिन्हें एक सोशल सिक्योरिटी फंड और ई श्रम पोर्टल के ज़रिए लागू किया जा रहा है.

वर्कर्स की हड़ताल और शिकायतों

हड़ताल क्यों हो रही है?
गिग वर्कर्स का कहना है कि वे लंबे समय से सिस्टम के शोषण का शिकार हो रहे हैं. उनकी बड़ी शिकायतों में से एक कम आमदनी और सुरक्षा की कमी होना भी है. इसके अलावा और भी कई वजहें हैं.

देशभर के गिग वर्कर्स जैसे जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और जेप्टो के राइडर्स ने अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने और काम बंद करने का ऐलान किया है. यह विरोध प्रदर्शन Gig and Platform Service Workers Union (GIPSWU) के नेतृत्व में हो रहा है. इससे पहले 26 जनवरी को भी उन्‍होंने हड़ताल की थी, लेक‍िन उनका कहना है क‍ि तब कोई समाधान नहीं न‍िकला था.

गिग वर्कर्स की प्रमुख मांगें

गिग वर्कर्स का कहना है कि वे लंबे समय से सिस्टम के शोषण का शिकार हो रहे हैं. उनकी बड़ी शिकायतों में से एक कम आमदनी और सुरक्षा की कमी होना भी है. इसके अलावा और भी कई वजहें हैं.

कम आमदनी और कोई सुरक्षा नहीं: पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रति ऑर्डर मिलने वाला पैसा कम होता जा रहा है. साथ ही, उन्हें न तो पेंशन मिलती है और न ही बीमा (Insurance) की सही सुविधा.

महिलाओं की सुरक्षा: महिला गिग वर्कर्स खासकर अर्बन कंपनी जैसी ब्यूटी और घरेलू सेवाओं वाली ने सुरक्षा और कार्यस्थल पर सम्मान की कमी को लेकर अपनी आवाज उठाई है.

क्‍या चाहते हैं ग‍िग वर्कर्स ?
केंद्रीय कानून: गिग वर्कर्स को मजदूर के रूप में औपचारिक पहचान मिले और उनके लिए एक अलग केंद्रीय कानून बने.

न्यूनतम वेतन: कम से कम 20 रुपये प्रति किलोमीटर का भुगतान या 24,000 रुपये मासिक वेतन तय हो.

न्यूनतम वेतन: राइडर्स की मांग है कि उन्हें कम से कम ₹20 प्रति किलोमीटर का भुगतान मिले या ₹24,000 मासिक वेतन तय किया जाए।

मजदूर का दर्जा: गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से ‘मजदूर’ माना जाए और उनके लिए केंद्रीय कानून बने।

सोशल सिक्योरिटी: उन्हें ईएसआई (ESI), पीएफ (PF) और पुख्ता दुर्घटना बीमा की सुविधा मिले।

पारदर्शी एल्गोरिदम: कंपनियां स्पष्ट करें कि राइडर्स की रेटिंग और कमाई किस आधार पर तय होती है।

ID ब्लॉकिंग पर लगाम: आईडी सस्पेंड करने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाए।

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